इबादतो की अर्ज़िया ख़ारिज़ हो रही है, साल दर साल,
पर कल के सूरज से उम्मीद है, मेरी अरदास अभी बाकी है...
रिस्ते ख़तम हो जाए, इसलिए मेरी चिट्ठियों का जवाब नही देते,
पर मेरे हाथो में हमारे रिश्तो की लकीर अभी बाकी है...
काट के मेरे यकीन की डोर, तुम्हे घमंड हो रहा है,
पर मेरी पतंग की बहुत उड़ान अभी बाकी है...
हक़ीकतो से लड़ते-लड़ते, तक गया हू,
पर ख्वाबों में मेरे अभी जान बाकी है...
ये जो बिखरी हुई ज़मीरो की लाशो से बू आ रही है,
पर मैं खुश हू, मेरा ज़मीर अभी बाकी है...
ज़िंदगी के उलज़नो में, उलाज गया हू मैं,
पर फिर से सुलझाने का हौसला अभी बाकी है...
पर कल के सूरज से उम्मीद है, मेरी अरदास अभी बाकी है...
रिस्ते ख़तम हो जाए, इसलिए मेरी चिट्ठियों का जवाब नही देते,
पर मेरे हाथो में हमारे रिश्तो की लकीर अभी बाकी है...
काट के मेरे यकीन की डोर, तुम्हे घमंड हो रहा है,
पर मेरी पतंग की बहुत उड़ान अभी बाकी है...
हक़ीकतो से लड़ते-लड़ते, तक गया हू,
पर ख्वाबों में मेरे अभी जान बाकी है...
ये जो बिखरी हुई ज़मीरो की लाशो से बू आ रही है,
पर मैं खुश हू, मेरा ज़मीर अभी बाकी है...
ज़िंदगी के उलज़नो में, उलाज गया हू मैं,
पर फिर से सुलझाने का हौसला अभी बाकी है...
