Wednesday, 1 January 2020

!! सफरनामा !!

इबादतो की अर्ज़िया ख़ारिज़ हो रही है, साल दर साल,
पर कल के सूरज से उम्मीद है, मेरी अरदास अभी बाकी है...

रिस्ते ख़तम हो जाए, इसलिए मेरी चिट्ठियों का जवाब नही देते,
पर मेरे हाथो में हमारे रिश्तो की लकीर अभी बाकी है...

काट के मेरे यकीन की डोर, तुम्हे घमंड हो रहा है,
पर मेरी पतंग की बहुत उड़ान अभी बाकी है...

हक़ीकतो से लड़ते-लड़ते, तक गया हू,
पर ख्वाबों में मेरे अभी जान बाकी है...

ये जो बिखरी हुई ज़मीरो की लाशो से बू आ रही है,
पर मैं खुश हू, मेरा ज़मीर अभी बाकी है...

ज़िंदगी के उलज़नो में, उलाज गया हू मैं,
पर फिर से सुलझाने का हौसला अभी बाकी है...

Tuesday, 13 August 2019

जज़्बात

तुमसे बिना कुछ सुने...
उससे मुजरिम करार दे दिया...
ये आदलत कहा से आई ?
पराई है अगर बेटी...
तो सोच...
ये अमानत तेरे दर कहा से आई ?
चार दीवारी में जो बाप कैद हो गया...
उस बाप को आज मौत की ज़मानत कहा से आई ?
जिस अफ़सर का  घर चल जाता है कुछ ले देकर...
उस को तनख्वाह देनी की ज़रूरत कहा से है आई ?
जज़्बात  ऐसे ही लिखता रहूँगा मैं..
और तुम सोचते रहना...
इसके क़लम में...
इतनी ताकत कहा से आई ?

Saturday, 16 February 2019

दिल की किताब













दिल की किताब, उसमें पन्ने हज़ार,
कुछ पन्ने ख़्वाबों के, वो मेरे इरादों के,
वो रंगीन पन्ने... पिछली यादों के,
कुछ पन्ने भीगे से, मेरी ज़िन्दगी में आए तूफनो से...
कुछ पन्ने फटे से, वो बुरे एहसासों के...​​
कुछ पन्ने ख़ाली हैं.... 
क्योंकि लिखना अभी बाक़ी हैं ।

Tuesday, 12 December 2017

|| आँसू ||

बहुत राहत महसूस हो रही है,
काफ़ी अच्छा लग रहा है, अब,
काफ़ी अरसे बाद बरसे हैं,
हलकी सी ठंडक हो गयी है, अचानक,
बहुत रंज भी हो रखी थी,
पर अब सब कुछ,
साफ़ और नया सा लग रहा है | 
ये आँसू भी क्या चीज है.....

Friday, 10 November 2017

|| शब्द ||

ख़याल उमड़ते रहते है,
दिन-रात...
और राह देखते है, शब्दो से मिलने की,
एक एक अक्षर को जोड़कर...
इन्हे समेटने की कोशिश करता हूँ,
लेकिन बड़े नटखट है ये,
लड़ते है, झगड़ते है आपस में,
तो कभी प्यार से जुड़ जाते है,
कुछ तो गमंड में चूर है...
कुछ सीधे सरल...
कुछ कुछ इंसानो सी ही फ़ितरत है इन शब्दो की...
इस से पहले इनहे कोई बहाना मिल जाए...
खुली दवात के सूखने का,
कागज़ पे इन शब्दो को उतार लेता हूँ |

Sunday, 27 August 2017

!! उसकी रज़ा क्या है ? !!

कभी नारियल लेकर,
तो कभी प्रसाद और हार लेकर,
हर रोज़ इबादत करने जाते हो...
उसके दर पर,
कभी अपना सिर झुकाते हो,
कभी अपनी ख्वाहिशों के लिए...
हर रोज़ उसकी दर पर भटकते हो...
कभी उससे परेशां करते हो...
हर रोज़ आपनी नयी उम्मीद लगाते हो...
आख़िर ए बँधे तू चाहता क्या है ?
कभी अपने खुदा से भी पूछो,
आखिर उसकी रज़ा क्या है ?

Friday, 21 July 2017

!! अलविदा, पर कहता…कैसे !!

घर छोड़ने से कुछ ही दिन पहले सामान बाँध लिया था....
आँखों के सूटकेस में यादो को अच्छी तरह डाल लिया था....
एक दो बार सूटकेस को खोल कर तसल्ली भी कर ली थी....
कि कही कुछ छूट तो नही गया है....
सोचा की अब अलविदा कह लूँ ....
दरवाजे पर पहुँच आखिरी बार देखने को मुड़ा तो मालूम हुआ....
बस कुछ खास सामान ही साथ ले जा रहा हूँ....
अभी तो मकान में बहुत सारा सामान बाकी पड़ा है....
फिर भी, सोचा की अलविदा कह लूँ, पर कहता…कैसे.... |