हर तरफ ख़ौफ्फ का मंज़र,
इंसान बने जैसे खंजर,
अपने शहर की ही नब्ज़ काटे,
ना जाने चले किस ओर,
एक ही कलाई से,
बह रही खून की अलग अलग धार है,
धीरे-धीरे आपना रंग खोता खून,
ना जाने कौनसे ग्रुप का है,
बस इतना पता है कि
नेगेटिव है |
इंसान बने जैसे खंजर,
अपने शहर की ही नब्ज़ काटे,
ना जाने चले किस ओर,
एक ही कलाई से,
बह रही खून की अलग अलग धार है,
धीरे-धीरे आपना रंग खोता खून,
ना जाने कौनसे ग्रुप का है,
बस इतना पता है कि
नेगेटिव है |