जो कभी सच्ची दोस्त थी...
अब महीनो, उसे मुलाकात नही होती...
ज़िंदगी के माहीने बदल गये है, शायद...
अभी भी मिलने के इंतज़ार में...
शीशों के पीछे से हसरातो से तकती है...
यादे धुंधली सी देखाई पड़ती है अब...
वो किताबो के साथ बिताई सोहबतो वाली शामे....
अब कंप्यूटर के सामने बीत जाती है |
अब महीनो, उसे मुलाकात नही होती...
ज़िंदगी के माहीने बदल गये है, शायद...
अभी भी मिलने के इंतज़ार में...
शीशों के पीछे से हसरातो से तकती है...
यादे धुंधली सी देखाई पड़ती है अब...
वो किताबो के साथ बिताई सोहबतो वाली शामे....
अब कंप्यूटर के सामने बीत जाती है |
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